“चलो इस बार, दिवाली कुछ ऐसे मनाते हैं।”

–डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा

चलो इस बार,
दिवाली कुछ ऐसे मनाते हैं,
एक दीप से दूसरा दीप जलाते हैं,
बुझे हुए दीपों को फिर से रोशन करते हैं,
पड़ोसी के आँगन में भी एक दीप जलाते हैं,
निर्धनों की बस्तियों में खुशियों के दीप जलाते हैं,
नन्हे-नन्हे मासूम चेहरों की मुस्कान बन जाते हैं,
चलो इस बार, दिवाली कुछ ऐसे मनाते हैं।

सरहद पर शहीद हुए जाँबाज़ सिपाहियों के,
घर-आँगन में दीपों की माला सजाते हैं,
जो इस दीपावली पर अपने घर नहीं लौट सकते,
उनके परिवारों के संग खुशियाँ बाँटते हैं,
मिल-बैठकर प्रेम से पकवान खाते हैं,
उनके सूने आँगन में अपनत्व के दीप जलाते हैं,
चलो इस बार, दिवाली कुछ ऐसे मनाते हैं।

माटी का नन्हा-सा दिया,
कितनी बड़ी सीख दे जाता है,
स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देना सिखाता है,
घी, तेल और बाती का साथ होना,
मिलकर एक छोटी-सी लौ को प्रज्वलित करना,
अमावस्या की काली रात को भी पूनम बना देता है,
चलो इस बार, दिवाली कुछ ऐसे मनाते हैं।

हम सब भी समाज के घटक हैं,
चाहें तो मिलकर एक नई अलख जगा सकते हैं,
देश और समाज में फैले अंधकार को,
अपने छोटे-छोटे प्रयासों से मिटा सकते हैं,
किसी के जीवन में उम्मीद का उजाला ला सकते हैं,
चलो इस बार, दिवाली कुछ ऐसे मनाते हैं।

आओ, हम भी एक ऐसा दीपक बन जाएँ,
बुझने से पहले किसी की राह रोशन कर जाएँ,
किसी की उम्मीद, किसी का विश्वास बन जाएँ,
किसी के चेहरे की खोई मुस्कान बन जाएँ,
अपने हिस्से का उजाला दूसरों में बाँट जाएँ,
चलो इस बार, दिवाली कुछ ऐसे मनाते हैं। चलो इस बार प्रदूषण रहित दिवाली मनाते हैं।

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