स्वयंसेवकत्व की अखंड यात्रा, ‘विठ्ठल’ से समाजमन के ‘विठ्ठलराव’ तक

– प्रदीप बालकृष्ण भोईर, संगठन एवं प्रबंधन शास्त्र के अध्येता

कुछ व्यक्तित्व पदों से बड़े होते हैं और कुछ अपने कार्य से। कुछ लोगों की पहचान उनके नाम के साथ जुड़े दायित्वों से होती है, तो कुछ ऐसे भी होते हैं जिनकी सबसे बड़ी पहचान उनका स्वयंसेवकत्व बन जाती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कोकण प्रांत कार्यवाह, शिक्षा क्षेत्र के अध्ययनशील नेतृत्व, समाजजीवन के कुशल समन्वयक और हजारों कार्यकर्ताओं के आत्मीय मार्गदर्शक श्री. विठ्ठल दुधाप्पा कांबले ऐसे ही व्यक्तित्व हैं, जिनका जीवन सेवा, समर्पण, संगठन और संस्कारों की सतत साधना का पर्याय बन गया है।
उनके जन्मदिवस के अवसर पर उनके व्यक्तित्व और कृतित्व का स्मरण करते हुए केवल एक व्यक्ति का परिचय नहीं मिलता, बल्कि संघ संस्कारों से निर्मित उस स्वयंसेवक की यात्रा सामने आती है, जिसने अपने जीवन को राष्ट्रकार्य के लिए समर्पित कर दिया।
एक कार्यक्रम में मंच संचालक ने उनके द्वारा निभाई जा रही अनेक जिम्मेदारियों का उल्लेख किया। भाषण के लिए खड़े होते ही उन्होंने अपनी सहज और विनोदी शैली में कहा, “आपने मेरी विभिन्न जिम्मेदारियों का परिचय दिया, लेकिन मेरी वास्तविक पहचान बताना भूल गए। मैं राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का स्वयंसेवक हूँ और यही मेरी सबसे बड़ी पहचान है।” यह वाक्य उनके व्यक्तित्व का सार है। पद से अधिक स्वयंसेवकत्व, प्रसिद्धि से अधिक कार्य, अधिकार से अधिक दायित्व और व्यक्तिपूजा से अधिक संगठन इन्हीं मूल्यों पर उनका जीवन आधारित है।
व्यवसाय से शिक्षक और चेंबूर एज्युकेशन सोसायटी के विद्यार्थियों के प्रिय प्रधानाचार्य के रूप में उन्होंने अनेक पीढ़ियों का निर्माण किया। उनके लिए शिक्षा केवल ज्ञानार्जन का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण की आधारशिला है। विद्यार्थियों, अभिभावकों, शिक्षकों और समाज के बीच संवाद और विश्वास का वातावरण निर्मित करते हुए उन्होंने शिक्षा को संस्कारों से जोड़ने का निरंतर प्रयास किया। इसी कारण वे केवल एक सफल प्रधानाचार्य नहीं, बल्कि एक प्रेरणादायी शिक्षक और संस्कारवान शिक्षाविद् के रूप में प्रतिष्ठित हैं।
समाजजीवन के विविध क्षेत्रों में सक्रिय रहते हुए उन्होंने असंख्य कार्यकर्ताओं को जोड़ा। समरसता, संवाद और सामूहिकता उनकी कार्यशैली की विशेष पहचान है। “संगच्छध्वं संवदध्वं” के वैदिक संदेश को उन्होंने व्यवहार में उतारा। आज समाज के सभी वर्गों के लोग उन्हें आत्मीयता से “विठ्ठलराव” कहकर संबोधित करते हैं। यह संबोधन किसी पद की देन नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास और अपनत्व का प्रतीक है।
चेंबूर एज्युकेशन सोसायटी का मैदान और सभागार पिछले कई दशकों से अनेक सामाजिक, शैक्षणिक और संगठनात्मक गतिविधियों का केंद्र रहा है। मुंबई के निजी अनुदानित विद्यालयों के कर्मचारियों को वेतन पथक दिलाने के लिए हुए ऐतिहासिक संघर्ष की शुरुआत भी इसी परिसर से हुई। अनेक बैठकों, योजनाओं और सामूहिक प्रयासों के फलस्वरूप यह संघर्ष सफल हुआ। इस प्रकार यह परिसर संघर्ष, समर्पण और सफलता का साक्षी बन गया।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कोकण प्रांत कार्यवाह के रूप में उन्होंने व्यक्तिनिर्माण, परिवार प्रबोधन, सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण और संगठन विस्तार को विशेष महत्व दिया। उनके लिए शाखा केवल एक दैनिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण का विश्वविद्यालय है। विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं में कार्यरत कार्यकर्ताओं को दायित्व सौंपने के साथ-साथ वे गुणवत्ता, व्यवस्थापन, संस्कार और समाजाभिमुखता के प्रति भी निरंतर सजग रहते हैं।
मुंबई महानगरपालिका क्षेत्र की निजी अनुदानित शालाओं के विभिन्न प्रश्नों के समाधान के लिए उन्होंने सदैव समन्वयकारी भूमिका निभाई। विभिन्न विचारधाराओं के संगठनों को एक सूत्र में पिरोकर सामूहिक शक्ति का निर्माण करना उनकी विशिष्ट क्षमता रही है। संघ प्रार्थना की पंक्ति “विजेत्री च नः संहता कार्यशक्तिः” में उनका अटूट विश्वास है। उन्होंने अपने कार्य से यह सिद्ध किया है कि संगठित शक्ति के सामने असंभव प्रतीत होने वाली चुनौतियाँ भी परास्त हो जाती हैं। कोविड महामारी के कठिन दौर में जब अनेक शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी और कार्यकर्ता संकट में थे, तब उन्होंने केवल औपचारिक संवेदना व्यक्त नहीं की, बल्कि चिकित्सा सहायता, मानसिक संबल और आत्मीय सहयोग प्रदान कर यह विश्वास जगाया कि संकट की घड़ी में कोई कार्यकर्ता अकेला नहीं है। “सेवा ही साधना है” इस भाव को उन्होंने अपने जीवन में साकार किया।
मुंबई प्राथमिक विभाग के अनुदानित विद्यालयों के कर्मचारियों के हिंदू कॉलोनी स्थित महामोर्चे के दौरान परिस्थितियाँ तनावपूर्ण हो गई थीं। ऐसे समय में संयम, अनुशासन और विश्वास के बल पर उन्होंने पूरे आंदोलन को शांतिपूर्ण बनाए रखा। संघर्ष के क्षणों में भी संगठनात्मक मर्यादा और अनुशासन को बनाए रखने का उनका यह प्रयास प्रेरणादायी है।
विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के प्रति उनकी विशेष संवेदनशीलता है। राष्ट्रभक्ति, सेवाभाव, सामाजिक उत्तरदायित्व, पर्यावरण संरक्षण और नेतृत्व क्षमता जैसे गुण विद्यार्थियों में विकसित हों, इसके लिए वे निरंतर प्रयासरत रहते हैं। खेल, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में स्वयं सहभागी होकर वे नई पीढ़ी को प्रेरणा प्रदान करते हैं। उनके कार्य से यह अनुभव होता है कि शिक्षक केवल पाठ पढ़ाने वाला नहीं, बल्कि व्यक्तित्व का शिल्पकार होता है।
मेरे व्यक्तिगत जीवन में उनका स्थान एक बड़े भाई जैसा है। विभिन्न संगठनों के समन्वय की जिम्मेदारियाँ निभाते समय अनेक कठिन परिस्थितियाँ सामने आईं। उन दिनों प्रायः उनका फोन आता था “प्रदीप, कैसे हो? कोई परेशानी तो नहीं?” अत्यंत व्यस्त जीवन के बावजूद हर परिस्थिति में साथ खड़े रहने वाला यह मित्र कब बड़े भाई का स्वरूप बन गया, इसका एहसास ही नहीं हुआ।
आज अनेक सेवानिवृत्त शिक्षिकाएँ, शिक्षकेतर कर्मचारी और सहयोगी मुस्कराते हुए पूछते हैं “भोईर, तुम्हारा यह विठ्ठल हमें कब पावेगा?” इस सहज प्रश्न में उनके प्रति लोगों के मन में बसे विश्वास, स्नेह और अपनत्व की झलक दिखाई देती है। इतना व्यापक कार्य करने के बाद भी पुरस्कार, प्रसिद्धि और पदों के प्रति उनमें कोई आकर्षण नहीं है। उनके लिए संघकार्य ही साधना है। इसलिए हजारों शिक्षक, शिक्षकेतर कर्मचारी और कार्यकर्ता विश्वासपूर्वक कहते हैं “कांबले सर हैं, तो समाधान अवश्य निकलेगा।” किंतु वे स्वयं सदैव इस बात पर बल देते हैं कि परिवर्तन किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि संगठित शक्ति से आता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के गीत की पंक्तियाँ मानो उनके जीवन का परिचय देती हैं
“तन समर्पित, मन समर्पित, और यह जीवन समर्पित,
चाहता हूँ देश की धरती, तुझे कुछ और भी दूँ।”
आज मेरा मित्र “विठ्ठल” समाजमन का “विठ्ठलराव” बन चुका है। यह सम्मान किसी पद, प्रतिष्ठा अथवा प्रसिद्धि का परिणाम नहीं, बल्कि स्वयंसेवकत्व, सेवा, समरसता, संगठन, संस्कार और आत्मीयता की लंबी साधना का प्रतिफल है।
कबीर ने कहा है
“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर।
पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर॥”
किन्तु विठ्ठलराव का जीवन उस वटवृक्ष की भाँति है, जिसकी छाया में असंख्य कार्यकर्ताओं को विश्वास, मार्गदर्शन और आत्मीयता का संबल प्राप्त होता है। ईश्वर से यही प्रार्थना है कि उनके माध्यम से समाजजीवन में सेवा, राष्ट्रनिष्ठा और संगठन का यह दीपक निरंतर प्रज्वलित रहता रहे और आने वाली पीढ़ियों को भी प्रेरणा देता रहे।

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