हम जश्न मनाते आजादी का, वो जान लुटाते हैं

–डॉ मंजू मंगल प्रभात लोढ़ा, वरिष्ठ साहित्यकार

एनबीडी मुंबई,

वो सीमा के दीपक थे, सरहद की रक्षा खातिर,
मिट गए, फिर भी चेहरे पर शिकन तक ना दिखी।
घर भी था, आँगन भी था, माँ की ममता साथ थी,
फिर भी तिरंगे के आगे हर खुशी बिसरा गए।

कभी बिटिया की हँसी याद, कभी माँ की आँखें,
कभी पत्नी का स्नेहिल स्पर्श साँसों में धुला रहता होगा।
सीने में कितने तूफ़ान, लबों पर चुप्पी रहती,
देश पुकारे जब एक बार, सब भावनाएँ सो जाती।

हम सोते हैं चैन की नींद, वो जागते रहते हैं,
हम दीये जलाते घर में, वो आग में जलते रहते हैं।
हम हँसते हैं त्योहारों में, वो खून बहाते हैं,
हम जश्न मनाते आज़ादी का, वो जान लुटाते हैं।

सर्दी, गर्मी, बारिश, आँधी – सब कुछ सह जाते हैं,
सीमा पर खड़े रहकर वो भारत को बचाते हैं।
ना तन की परवाह उन्हें, ना जीवन की फ़िक्र,
मौत से आँख मिलाकर भी वो मुस्कुरा जाते हैं।

याद तो आती होगी उन्हें भी अपने गाँव की,
पर वर्दी पहनते ही वो कसम निभाते हैं।
दिल रोता होगा अंदर से, पर होंठ नहीं काँपते,
तिरंगे के लिए हर आँसू छुपा जाते हैं।

जब ताबूत में लिपटकर वो घर वापस आते हैं,
तब माँ के आँचल में सारे सावन बरस जाते हैं।
पूरा देश सिर झुकाकर चुपचाप खड़ा होता है,
एक जांबाज शहीद होता है ,तब भारत और बड़ा होता है।
हम सोते हैं चैन की नींद,वो जागते रहते हैं,हम घर में सुरक्षित हैं,वो सरहद पर रहते हैं। हमारी हर सांस में उनका बलिदान बसा है,हर तिरंगे की लहर में उनका सम्मान बसा है।

सलाम तुम्हें ऐ सीमा के दीपकों, ये धरती तुम्हारी है,
हम ज़िंदा हैं तुम्हारे दम पर, ये आज़ादी तुम्हारी है।

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