–शिवपूजन पांडे, वरिष्ठ पत्रकार
एनबीडी मुंबई,
मुंबई महानगरपालिका समेत महाराष्ट्र की अन्य महानगरपालिकाओं में 15 दिसंबर को मतदान होने जा रहा है। परिणाम की हवा का रूख महायुति की तरफ जाता दिखाई दे रहा है। इस बार के चुनाव में पहली बार देखने को मिल रहा है, जब पूरे महाराष्ट्र में रहने वाले उत्तर भारतीयों का भाजपा की तरफ स्पष्ट झुकाव है। ऐसे में सवाल उठता है कि उत्तर भारतीय मतदाता इतने संगठित क्यों हैं? कांग्रेस तथा अन्य विपक्षी पार्टियों द्वारा बड़ी संख्या में उत्तर भारतीयों को टिकट देने के बावजूद आखिर उत्तर भारतीय मतदाता अपना पाला बदलने के लिए तैयार क्यों नहीं दिख रहे? पिछले चुनाव में चलने वाला जाति कार्ड भी इस बार के चुनाव में फ्लॉप होता नजर आ रहा है।
देखा जाए तो इसका सबसे बड़ा कारण मनसे और यूबीटी का एक साथ आना और महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्य मंत्री कृपाशंकर सिंह का उत्तर भारतीयों की तरफ खुलकर बोलना है। मीरा भाईंदर महानगरपालिका चुनाव में उत्तर भारतीय महापौर की मांग करके उन्होंने महाराष्ट्र में रहने वाले सभी उत्तर भारतीय मतदाताओं का दिल जीत लिया। लोगों ने खुलकर कहना शुरू किया कि कम से कम एक उत्तर भारतीय नेता तो है जो उनके लिए महापौर तक की मांग करता है। यद्यपि कृपाशंकर सिंह ने महापौर की मांग सिर्फ मीरा भाईंदर महानगरपालिका के लिए किया था।
इसमें कोई संदेह नहीं कि कृपाशंकर सिंह ने इस बार कड़ी मेहनत की। उत्तर भारतीय बाहुल्य इलाकों में ताबड़तोड़ सभाएं, पदयात्राएं और घर घर जाकर महायुति के पक्ष में मतदान करने की अपील की। कृपाशंकर ने एक बड़ा काम यह भी किया कि उन्होंने भाजपा के बागियों को मनाकर बैठाया, जिसके चलते अनेक वार्डों में कमजोर दिख रही भाजपा ताकतवर हो गई। पहली बार कृपाशंकर सिंह ने सोशल मीडिया की ताकत दिखाई। वह लगातार सोशल मीडिया पर एक्टिव रहे और उत्तर भारतीयों को भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों के पक्ष में मतदान करने की अपील करते रहे। इसमें कोई दो राय नहीं कि उत्तर भारतीय मतदाता सबसे ज्यादा कृपाशंकर सिंह पर ही भरोसा और विश्वास करता है और राजनीति की मंजिल तय करता है।
