धरती ने पहना बसंती वस्त्र- डॉ मंजू मंगलप्रभात लोढ़ा

एनबीडी मुंबई

आज वसंत पंचमी का पावन पर्व है। प्रकृति मुस्कुरा रही है, चारों ओर पीले फूलों की छटा बिखरी है, मानों धरती ने स्वयं बसंती वस्त्र पहन लिए हों। शीत ऋतु की विदाई और वसंत के आगमन के साथ जीवन में नई ऊर्जा, नई आशा और नई सृजनात्मकता का संचार होता है। वसंत पंचमी को अभिजीत मुहूर्त भी कहा जाता है—यह ऐसा शुभ दिन है जिसमें बिना विशेष मुहूर्त देखे किसी भी मंगल कार्य का आरंभ किया जा सकता है। विद्या आरंभ, लेखन, संगीत, कला और साधना के लिए यह दिन अत्यंत फलदायी माना गया है।इसी पावन तिथि को माँ सरस्वती का अवतरण दिवस भी माना जाता है—ज्ञान, वाणी, विवेक और सृजन की अधिष्ठात्री देवी। आज के दिन उनके चरणों में वंदन कर हम अपने जीवन को अज्ञान से ज्ञान की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने का संकल्प लेते हैं।

देखो वसंत पंचमी का शुभ दिन आया,
माँ सरस्वती के अवतरण का मंगल दिन आया।
सफेद वस्त्रों में सुसज्जित,
मुख पर असीम शांति, होठों पर मधुर मुस्कान,
आँखों से छलक रहा स्नेह का निर्झर,
कितनी सुंदर मेरी माँ है भारती-वागेश्वरी।
हाथों में तेरे वीणा है,
सुरों की तू सुरीली देवी,
तुझसे ही है सारा संगीत,
राग-रागनियाँ और मधुर लहरियाँ।
कितनी मीठी, शहद-सी तेरी वाणी,
मेरी माँ है वीणापाणी।
हंस पर तू विराजित,
मोतियों-सी तू दमकती,
तेरे चेहरे का दिव्य नूर
कर देता मन का सारा संताप दूर।
हर लो हमारा अज्ञान, दे दो हमें ज्ञान,
मेरी माँ है हंसवाहिनी।
तू ब्रह्मा पुत्री – वेदों की अधिकारी,
शब्द-शब्द में तू समायी।
माँ से शुरू हुआ संसार,
तुझसे ही पाया अक्षर-अंक का ज्ञान।
दे दो हमें वरदान, बना लो अपना अधिकारी-वारिस,
मेरी माँ है शारदे माँ।
महाश्वेता, ज्ञानंदा, गिरा-वागीश-वागेश्वरी,
तेरी कृपा बिना सब कुछ अधूरा।
तुझको क्या कहूँ,
धरो अपना हाथ सिर पर हमारे,
दे दो ऐसा आशीष
कुछ ऐसा लिख जाएँ, कुछ ऐसा बोल जाएँ,
दुनिया में अपना जन्म सफल कर जाएँ।
मेरी हे माँ सरस्वती देवी,
मेरी हे माँ सरस्वती-शारदा देवी।

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